@सोनू सालवी

जोबट – जोबट नगर में इन दिनों नगर परिषद द्वारा चलाई जा रही अतिक्रमण विरोधी मुहिम सुर्खियों में बनी हुई है। परंतु यह मुहिम अब अपनी निष्पक्षता को लेकर कठघरे में खड़ी नजर आ रही है। जनचर्चा का बाजार गर्म है कि नगर परिषद की कार्यवाही गरीबों पर बिजली बनकर टूट रही है, जबकि रसूखदारों पर रहम की चादर तानी जा रही है। नगर परिषद द्वारा शुरू हुई यह कार्यवाही फिलहाल आमजन पर भारी पड़ती दिख रही है। छोटे दुकानदारों, गरीबों और मध्यमवर्गीय परिवारों के नाली के ऊपर बने ओटले जेसीबी की पहली चोट का निशाना बन रहे हैं, जबकि नगर के मुख्य बाजारों और रोड पर वर्षों से जमे बड़े व्यापारियों और धनकुबेरों के अतिक्रमण पर परिषद की नजरें शर्म से झुकी हुई दिख रही हैं।

चुनिंदा कार्रवाई या साफ-साफ पक्षपात
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि उनके घरों के बाहर नालियों पर बने ओटले बिना कोई पूर्व सूचना के तोड़ दिए गए, वहीं पार्षदों, नेताओं और धनाढ्य परिवारों के मकानों के बाहर बने ओटले जस के तस खड़े हैं। इससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या नगर परिषद की जेसीबी सिर्फ गरीब की झोपड़ी तक ही सीमित है? क्या नेताओं और सेठों के ओटले अतिक्रमण की श्रेणी में नहीं आते?

सीएमओ संतोष राठौड़ का कहना है कि जहां-जहां नालियां जाम हो रही हैं, वहीं कार्रवाई की जा रही है। लेकिन यह तर्क आम जनता के गले नहीं उतर रहा है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या केवल गरीबों के घर के आगे की नालियां ही जाम होती हैं क्या रसूखदारों की नालियां ‘विकास’ की धारा में बह रही हैं?
सड़क किनारे किराए की दुकानें, जेब में जाती मोटी रकम
नगर में अनेक स्थायी दुकानों को लोगों ने किराए पर चढ़ा रखा है और मोटी कमाई कर रहे हैं। बावजूद इसके, इन पर कार्रवाई नहीं होना यह दर्शाता है कि परिषद की कार्यवाही में कहीं न कहीं मिलावट है।

नगर परिषद की कार्रवाई के दौरान आम नागरिकों ने कर्मचारियों पर महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार के आरोप भी लगाए हैं। कुछ महिलाओं का कहना है कि उनके विरोध करने पर परिषद के कर्मचारियों ने उन्हें अपमानित किया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या परिषद के कर्मचारी अनुशासन से मुक्त हो चुके हैं? क्या सीएमओ ने इन्हें खुलेआम छूट दे रखी है?
अधिकारियों की चुप्पी और प्रशासन की निष्क्रियता
नगर में चर्चा है कि स्थानीय प्रशासन ही नहीं बल्कि जिला प्रशासन भी इस भेदभावपूर्ण कार्यवाही पर आंख मूंदे बैठा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि “ऊंट भी पहाड़ के नीचे आकर भूल गया कि उसकी गर्दन कितनी लंबी है?

”जोबट की यह अतिक्रमण मुहिम अब सिर्फ अतिक्रमण हटाने की मुहिम नहीं रही, बल्कि यह प्रशासन की नीयत और नीति पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह बन गई है। अब देखना यह है कि क्या यह कार्रवाई भविष्य में निष्पक्षता की ओर मुड़ेगी या यूं ही कमजोर पर जोर और मजबूत पर मौन का खेल चलता रहेगा।
लोगों की जुबानी: हमारा क्या कसूर था। नगर परिषद की अतिक्रमण कार्यवाही को लेकर जहां एक ओर प्रशासन अपने तर्क दे रहा है, वहीं आमजन के मन में गुस्सा और पीड़ा दोनों साफ झलक रही है। पीड़ितों के बयान इस बात की गवाही देते हैं कि कार्यवाही में भेदभाव का आलम कितना गहरा है।
“नगर परिषद की यह पूरी कार्यवाही एकतरफा है। बिना किसी सूचना के मेरे घर के बाहर नाली पर बना ओटला तोड़ दिया गया, जबकि मेरे सामने ही ऐसे कई ओटले आज भी जस के तस खड़े हैं। यह आखिर किस नियम के तहत हो रहा है – राकेश श्रीवास्तव
हम छोटे लोगों के ओटले तोड़ दिए गए, जबकि बड़े नेताओं – चाहे वे भाजपा से हों या कांग्रेस से – उनके घरों के आगे बने ओटले नहीं तोड़े जाते। क्या नियम कानून केवल हम पर लागू होते हैं -प्रमोद कुमार राठौड़
छोटे दुकानदारों और आम जनता पर कार्रवाई हो रही है, जबकि जो लोग सालों से पक्के अतिक्रमण कर के बैठे हैं, या मकानों से बाहर तक छज्जे निकाल चुके हैं, उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया गया। य पूरी तरह से पक्षपात है। – दीक्षांत शर्मा
हम लोग दिनभर मेहनत करके दो वक्त की रोटी कमाते हैं, 4-5 घंटे ठेला लगाते हैं और फिर घर चले जाते हैं। अब अगर हमें ही दुकान लगाने से रोका जाएगा तो घर कैसे चलाएं ऊपर से परिषद के कर्मचारी हमसे बदतमीजी से बात कर रहे हैं। हमारा माल भी सड़ जाएगा। –चंपा भामदरें





रसूखदारों के पक्के अतिक्रमण से परिषद ने किया किनारा


